Thursday, August 10, 2017

चरवाहें

मैंने देखा है
चरवाहों को खेजड़ी की
छाँव तले अलगोजों पर
मल्हार गाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को जंगल में
कमर से बंधी रोटी को
प्याज के साथ खाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को भेड़ के नवजात
बच्चे को गोद में लेकर
घर लौटते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को शाम ढले
पशुओं के झुण्ड को
घर लाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को चिंता रहित
मस्त एवं स्वच्छंद जीवन
जीते हुए।



Friday, August 4, 2017

दो कविता

मन समझता है

एक सुबह
उस दिन हुयी थी
जब तुम मेरे साथ थी

एक सुबह
आज हुयी है जब
तुम मेरे साथ नहीं हो

मन समझता है
दोनों में कितना
अन्तर है।


 तुम जो साथ नहीं हो

जब तक तुम मेरे साथ थी
मुझे नदी, नाले
पहाड़,उमड़ते बादल
हरे-भरे खेत और
खलिहान
सभी अच्छे लगते थे

अच्छे तो वो आज भी है 
लेकिन अब अकेले ये नज़ारे
देखे नहीं जाते।