Thursday, August 10, 2017

चरवाहें

मैंने देखा है
चरवाहों को खेजड़ी की
छाँव तले अलगोजों पर
मल्हार गाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को जंगल में
कमर से बंधी रोटी को
प्याज के साथ खाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को भेड़ के नवजात
बच्चे को गोद में लेकर
घर लौटते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को शाम ढले
पशुओं के झुण्ड को
घर लाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को चिंता रहित
मस्त एवं स्वच्छंद जीवन
जीते हुए।



Friday, August 4, 2017

दो कविता

मन समझता है

एक सुबह
उस दिन हुयी थी
जब तुम मेरे साथ थी

एक सुबह
आज हुयी है जब
तुम मेरे साथ नहीं हो

मन समझता है
दोनों में कितना
अन्तर है।


 तुम जो साथ नहीं हो

जब तक तुम मेरे साथ थी
मुझे नदी, नाले
पहाड़,उमड़ते बादल
हरे-भरे खेत और
खलिहान
सभी अच्छे लगते थे

अच्छे तो वो आज भी है 
लेकिन अब अकेले ये नज़ारे
देखे नहीं जाते।

Thursday, July 13, 2017

एक कहानी का अन्त

चिता पर
लाया हुवा सारा सामान
रख दिया गया
चन्दन की लकड़ियों पर
घी उड़ेल दिया गया
चिता के चारों गिर्द घूम
पानी का मटका भी
फोड़ दिया गया
बेटे ने लकड़ी जला
मुखाग्नि भी दे दी
कल ठंडी पड़ी आग से
बची-खुची हड्डियां भी
इकट्ठी कर
गंगा को समर्पित हो जाएंगी।

और इसी के संग
भस्म हो जाएंगी
मेरे जीवन की सभी आशाएं
अंत हो जाएगा
एक कहानी का
जो पूरी लिखी जाने से
पहले ही दम तोड़ गई।




Saturday, May 20, 2017

जीवन का एक कटु सत्य

सुबह सवेरे
चाय के साथ
जब मैं सन्मार्ग पढ़ता हूँ
मुख्य पृष्ठ पर
सरसरी निगाहें डाल
मैं सीधा तथाकथित पेज
पर चला जाता हूँ
जहां एक अदद तस्वीर
के  साथ लिखा होता है
"बड़े दुःख के साथ सूचित
किया जाता है कि  ----"
यह देखने कि आज कोई
परिचित तो नहीं चला गया
मन में ख़याल आता है
एक दिन मेरा फोटो भी
इसी पेज पर छपेगा
मैं भी उस दिन एक
समाचार बन जावूंगा
घरकी दीवार पर फ्रेम में
लग जाएगी एक तस्वीर
पहना दी जाएगी माला
पुण्य तिथि पर बहु
एक पंडित को बुला कर
करवा देगी भोजन
दे देगी दक्षिणा में
एक धोती-गंजी और चंद रुपये
मेरा यह ख़याल
जीवन का एक कटु सत्य है
जिस पर हम सब को
विश्वास करना ही होगा।





Saturday, May 13, 2017

कुछ तो कह कर जाती

आज अचानक
सुना हो गया मेरा जीवन
क्या गलती की थी मैंने
जो मिला विछोह का
इतना बड़ा दर्द
अब तो आजीवन
अफसोस ही बना रहेगा
अंत समय नहीं था पास तुम्हारे
तुमने इतना वक्त भी नहीं दिया
कि आकर कर लेता थोड़ी सी बात
लोग पूरी करते है शतायु
अभी तो कईं बरस बाकी थे
रुक जाती कुछ और
भोगती जीवन का सुख
करते-करते सबकी देखभाल
अभी जाकर ही तो मिला था
थोड़ा आराम
चार-चार बेटे-बहुएं
सात पोते-पोतियाँ
भरा-पूरा परिवार
सब सुख था जीवन में
जानें क्यों रुठ गई अचानक
चली गई अनंत में
कहाँ खोजें और कहाँ देखें
अब कहने को भी कुछ नहीं बचा
शिकायत करें तो भी किससे
तुम तो चली गई
काश ! जाने से पहले
कुछ तो कह कर जाती।







Friday, May 12, 2017

आँखें छलछला उठती है

आज की तारीख
अठाइस अप्रेल दो हजार 
सतरह -शुक्रवार 
मैं चीन की धरती पर।
सिर ताने खड़ी है मेरे सामने 
चीन की विशालतम दिवार
फुसफुसा रही है वो 
कुछ कहने को  मुझे।

मैंने कान लगाया 
टूटे-फूटे पत्थरों से 
आवाज आई 
अकेले आये हो 
कहाँ है तुम्हारी जीवन संगिनी
क्यों नहीं लाये उसे साथ ?

जब तुम आस्ट्रेलिया के
समुद्री नजारों को देखने गए
जब तुम स्वीट्जरलैण्ड की
मनोरम वादियाँ देखने गए
जब वेनिस की ठण्डी हवा खाने गए
जब ग्रेट बैरीयर रीफ देखने गए
हर समय वो तुम्हारे साथ रही।
आज क्यों छोड़ आये उसे
क्यों नहीं साथ लाए उसे
चीन की दीवार दिखाने ?

मेरे लिए कदम बढ़ाना
मुश्किल हो गया
मन में इस तरह के भाव
पहले भी कईं बार आ चुके हैं। 

चाहे वो गोवा के समुद्र तट हो 
या दुबई की गर्म रेत,
जहां भी मैं अकेला गया 
मेरे कानों को हर जगह 
यह  सुनाई पड़ा है
कुदरत के करिश्में के सामने
आँखें स्वतः छलछला उठती है। 





Tuesday, April 18, 2017

ममता की मूरत

तुम
बदली बन बरसती रही
करती रही प्यार की
बरसात सभी पर।

तुम
जलधारा बन बहती रही
छलकाती रही
प्रेम-रस सभी पर।

तुम
लोरी बन गाती रही
लहराती रही
प्यार का आँचल
सभी पर।

तुम
किरण बन चमकती रही
लुटाती रही चांदनी
सभी पर।

तुम
ममता की मूरत बन झरती रही
बहाती रही स्नेह की धारा
सभी पर।







Monday, April 17, 2017

गाँव की गलियों में बचपन

देश के महानगर में 
रह कर भी मुझे
गाँव की याद आती है 

आलिशान कोठियों में 
रह कर भी
मुझे गाँव वाले घर की
याद आती है। 

हवाई जहाजों में सफर
करते  हुए भी 
मुझे  बैल गाड़ी की
याद आती है।  

शितताप नियंत्रित 
घरों में रहते हुए भी मुझे
बरगद की ठण्डी छाँव 
याद आती है। 

पांच सितारा होटलों में 
खाना खाते हुए भी मुझे 
माँ के हाथ की रोटी की 
याद आती है। 

कर्ण-प्रिय संगीत  
सुनते हुए भी मुझे 
अलगोजे पर मूमल की
याद आती है।   

सुखी जीवन
जीते हुए भी मुझे
गाँव की गलियों में बिताए
बचपन की याद आती है।






Saturday, April 8, 2017

स्मृति मेघ

पचास ऋतुचक्रों को समर्पित
इस जीवन के संग-सफर में
आज हर एक मोड़ पर
मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा
जरुरत है।

पर मैं जानता हूँ
तुम अब इस जीवन में
मुझे कभी नहीं मिलोगी।

मैं चाह कर भी
तुम्हारी कोई झलक
कोई आवाज
कोई खबर
नहीं ले पाऊंगा।

फिर भी मैं तुम्हें
हर मौसम
हर महीने
हर सप्ताह
हर दिन
हर लम्हा
पूरी उम्र भर
इस जीवन के सफर में जीवूंगा।




Friday, April 7, 2017

मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया

   मेरे जीवन में पायल की झनक नहीं रही    
    मेरे जीवन में फूलों की खुशबु नहीं रही
     मेरा सूरज सिंदूरी सांध्यवन में खो गया 
      मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया।  

                                                          मेरी पलकों में सुनहरा स्वप्न नहीं रहा  
                                                         मेरे होठों पर प्यार भरा गीत नहीं रहा
                                                          मेरे जीवन का मंगल गान बिसर गया 
                                                         मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया।  

    मेरे  जीवन में सुनहरी रातें नहीं रही 
   मेरे जीवन में कोई खुशियां नहीं रही  
   मेरे जीवन में घनघोर अँधेरा छा गया 
 मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया।  

 मेरी पलकों में कोई तमन्नाएँ नहीं रही                                                   
  मेरे दिल में कोई आशाएँ  नहीं रही                                                   
           जीवन से बहारों का काफिला गुजर गया                                                   
                                            मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया।                                                 







                 

                                                    
                                      

Tuesday, March 14, 2017

याद आता है, मुझको मेरा गाँव

बहुत याद आता है, मुझको मेरा गाँव।
कुँआ वाले पीपल की, ठंडी ठंडी छाँव।

बैलो वाली गाड़ी और हरे-हरे खेत।
याद आती है मुझे, धोरा वाली रेत।
कुऐ का पीना, ठंडा-ठंडा पानी।
याद आती है, दादी की कहानी।

लम्बी-लम्बी बाजरी, रोईड़ा का फूल।
याद आती है मुझे, गलियों की धूल।
सर्दी की रातें और गोधूलि की बेला।
रात में खेलना लुका छिपी का खेला।

सावन में झूला और रंगों से होली।
मुझे याद आती है, प्यारी दिवाली। `
गणगौर का मेला, बैलों का दौड़ना।
सभी को प्यार से, रामराम कहना।

बहुत याद आता है, मुझको मेरा गाँव।
कुँआ वाले पीपल की, ठंडी ठंडी छाँव।


Monday, March 6, 2017

आज भी

आज भी लगी है
उस दर्पण पर तुम्हारी बिंदी
जहाँ संवारा करती थी
तुम अपने बालों को

आज भी पड़े हैं 
पार्क की पगडंडी पर
तुम्हारे पांवों के निशान
जहाँ जाती थी तुम घूमने को

आज भी छत पर
 पक्षियों की टोलियां
करती है तुम्हारा इन्तजार 
दाना-पानी लेने को 

आज भी दरवाजे पर 
धोली गाय आकर रंभाती है 
खाने गुड़ और रोटी को

आज भी मिलती है
सूखे गुलाब की पंखुड़ियां
खोलता हूँ जब किताब को 

Monday, January 23, 2017

जीवन बे-राग री

कहने को जीवन
खाली मन-प्राण
प्यार के आभाव में
फीका सब गान
साज टूटा, स्वर रूठा,जीवन बे-राग री।

तन्हाई में रहना
जुदाई को सहना
घुट-घुट कर जीना
टूट-टूट बिखरना 
उदासी छाई,आँखे भर आई,मिटा अनुराग री।

भूल गए  हम तो
मिलन की बातें
याद भला कहाँ
वो सुनहरी रातें
याद दिलाई, प्रीत लगाईं, बजा मृदु राग री।

झोली भर लाई
नेह भरी बातें
होंठ फिर हँसे
सुन प्रीत की बातें
तुमने जगाई, फिर लगाई, प्रेम आग री।


Wednesday, January 18, 2017

कथनी और करनी

मैं पढ़ता रहा
समाजवाद, मार्क्सवाद
और प्रजातंत्रवाद पर लिखी पुस्तकें
और तुम खिलाती रही भिखारियों को,
गायों को और कुतो को रोज रोटी।

मैं सुनता रहा पर्यावरण पर
लंबे-चौड़े भाषण और
तुम पिलाती रही तुलसी को
बड़ को और पीपल को रोज पानी।

मैं चर्चाएं करता रहा
टालस्टाय, रस्किन और
गाँधी के श्रम की महता पर
और तुम करती रही सुबह से
शाम तक घर का सारा काम।

मैं सेमिनारों में सुनाता रहा
पशु-पक्षियों के अधिकारों के बारे में
और तुम रोज सवेरे छत पर
देती रही कबूतरों को, चिड़ियों को
और मोरो को दाना-पानी।

मैं सुनता रहा
उपदेशो और भाषणों को
और तुम रोज पढ़ाती रही
निर्धन बच्चों को
देती रही उन्हें खाना
कपड़े और दवाइयाँ।

तुमने मुझे दिखा दिया
दुनिया कथनी से नहीं
करनी से बदलती है।

काम कर्मठ हाथ करते हैं
थोथले विचारों से
दुनिया नहीं बदलती है।