Wednesday, December 13, 2017

मेरी आँखें भर आई

सूर्य का प्रकाश
कमरे से लौट रहा है
शाम का धुंधलका
अपने पांव पसार रहा है

मैं अकेला कमरे में
लौट आया हूँ
तुम्हारे संग बिताए
दिनों को याद कर रहा हूँ

मैं अपने अकेलेपन में
तुम्हारे अकेलेपन को
ढूंढ़ रहा हूँ
तुम्हारी यादों के छोरों को
मैं अपने संग जोड़ रहा हूँ

तुम्हारी मृत्यु के साथ
थोड़ी बहुत मृत्यु मुझे भी आई है
कमरे की दीवार पर लगी तुम्हारी
तस्वीर देख मेरी आँखें भर आई है।

Friday, December 8, 2017

तुम आओगी ना

दिसंबर आ गया
तुम्हारा पश्मीना साल
अभी तक ज्यों का त्यों
रखा है अलमारी में
तुम्हें ही ओढ़ना है ना
तुम आओगी ना

ठण्ड भी बढ़ गई है
मेरा स्वेटर, मफलर
निकाल कर धुप में
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना

सुबह उठ कर
अदरक वाली चाय बना
तुम्हें ही पिलाना है ना
तुम आओगी ना

मीठी आंच में सेंक
गरम-गरम भुट्टे
निम्बू-नमक लगा
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना।




Wednesday, November 29, 2017

अक्सर मैं जब तनहा होता

अक्सर मैं जब तनहा होता, गीत तुम्हारे लिखता हूँ
बैठ कल्पना के पंखों पर, तुमसे मिलता रहता हूँ।

भूल हुई मुझसे जीतनी भी, मैं स्वीकार उन्हें करता हूँ
छोड़ गई मझधार मुझे तुम, यह स्वीकार नहीं करता हूँ। 

तुम तो भूल गई मुझको, पर मैं तो याद सदा करता हूँ
एक बार देखो ऊपर से, कब से तुम्हें निहार रहा हूँ।

रातों की बोझिल पलकों में, यादों के संग मैं सोता हूँ 
  सपनों की गोदी  में चढ़ कर, तुम से मिलता रहता हूँ।  

खुशबू तुम्हारी यादों की, ख़यालों में बसाए रखता हूँ
होंठों पर सजा कर मैं उनको, गुनगुनाया करता हूँ।

कैसे कहूँ मैं अपने दिल की, जो कुछ कहना चाहता हूँ 
  बिना तुम्हारे अब एक पल भी, नहीं रहना मैं चाहता हूँ।




Thursday, November 23, 2017

मुझे आज भी तुम्हारा इन्तजार है

मेरे ख्यालों में तुम थी
मेरे ख़्वाबों में तुम थी
मेरे परिहास में तुम थी
मेरे समर्पण में तुम थी
मुझे आज भी तुम्हारा इन्तजार है।

मेरी शायरी में तुम थी
मेरी कविता में तुम थी
मेरी मोहब्बत तुम थी
मेरी आराधना तुम थी
मुझे आज भी तुम्हारा इन्तजार है।

मेरी सासों  में तुम थी
मेरी बातों में तुम थी
मेरी जीवन-धारा तुम थी
मेरी प्रेम-कहानी तुम थी
मुझे आज भी तुम्हारा इन्तजार है। 

मेरी कल्पना तुम थी
मेरी भावना तुम थी
मेरी हमसफ़र तुम थी
मेरी जीवन-मंजिल तुम थी
मुझे आज भी तुम्हारा इन्तजार है। 





Monday, November 20, 2017

प्रिया मिलन को जियरा तरसे

सावन आयो बदरा बरसे
प्रिया मिलन को जियरा तरसे।

उमड़-घुमड़ कर बदरा छाए
मन में प्रिय की याद सताए
पुरवा बह के अगन लगाए
नेह - निमंत्रण याद दिलाए

सावन आयो बदरा बरसे
प्रिया मिलन को जियरा तरसे।

मयूरा नाचै सौर मचाए
पिऊ की बोली प्यार जगाए
मल्हा मेघ मल्हार सुनाए
घूँघट पट की याद दिलाए

सावन आयो बदरा बरसे
प्रिया मिलन को जियरा तरसे।

प्रिया प्रिया पपिहारी गाए
मृग-नयनी की याद सताए
मधुर कंठ से कोयल गाए
विरह-वेदना मन तड़फाए

सावन आयो बदरा बरसे
प्रिया मिलन को जियरा तरसे।



मैं आज अकेला रह गया

मेरा जीवन साथी बिछुड़ गया
          मेरा प्यार का पंछी उड़ गया
                    मैं जीवन राह में भटक गया  
                                मैं आज अकेला रह गया।  

मेरे प्यार का झरना सुख गया
         मेरा सावन पतझड़ बन गया
                     मैं मरुभूमि सा सुख गया                          
                              मैं आज अकेला रह गया।  

मेरा प्यार का मंदिर ढह गया
             मेरा गीत अधूरा रह गया 
                    मैं राह सफर में छूट गया 
                              मैं आज अकेला रह गया।  

मेरा स्वपन सलोना टूट गया
          मेरा जीवन नीरस बन गया 
                  मैं अब जीवन से हार गया
                              मैं आज अकेला रह गया।


Monday, October 30, 2017

पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै (राजस्थानी)

पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै
म्हारी तो मृगानैणी बसै दूरा देश रै।

कोई सामण आवै तीज रै
मेंहदी रचा दिखाती हाथ रै
पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै
म्हारी तो मृगानैणी बसै दूरा देश रै।

कोई सामण आवै सावण रै
झूला झूलती देतो हिलौर रै
पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै
म्हारी तो मृगानैणी बसै दूरा देश रै।

कोई सामण आवै गणगौर रै
दिखाती कर सोलह सिणगार रै
पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै
म्हारी तो मृगानैणी बसै दूरा देश रै।

कोई सामण आवै पुष्कर मेळो रै
रंगीलो चुड़लो पेहरातो ल्याय रै
पपैया मत ना बोल नीम री डाल रै
म्हारी तो मृगानैणी बसै दूरा देश रै। 

Wednesday, October 18, 2017

साथी मेरा चला गया था

एक कलख है मन में मेरे
        अंत समय में पास नहीं था
                 मीलों लम्बा सफर किया पर
                         तुम से बातें कर न सका था।

देख तुम्हारी नश्वर देह को
        लिपट-लिपट कर मैं रोया था
                जीवन भर तक त्रास रहेगी
                      यम से तुमको छिन न सका था।

आँखों में अश्रु जल भर कर
        मरघट तक मैं साथ गया था
                 पंच तत्व में विलिन हुई तुम
                          मैं खाली हाथ लौट पड़ा था। 

सारी खुशियाँ मिट गई मेरी
         सुख का जीवन रित गया था
                 जीवन का अनमोल खजाना
                          मेरे हाथों से निकल गया था।



Monday, October 16, 2017

कश्मीर कल और आज

कल तक 

पहाड़ों पर दमकती बर्फ
चिनार पर चमकती शबनम
खेतों में महकती केशर
धरती का जन्नत था कश्मीर।

डलझील में तैरते शिकारे
वादियों में महकते गुलाब
फिजाओं में घुलती मुहब्बत
धरती का जन्नत था कश्मीर।

शिकारों में घूमते शैलानी
घाटी में फूलते ट्यूलिप
झीलों पर तैरते बाज़ार
धरती का जन्नत था कश्मीर।

और आज 

माँ ओ की ओढ़नी छिन  गई
बेटियों की अस्मिता लूट गई
मांगो का सिंदूर उजड़ गया
जन्नत नरक में बदल गया।

केसर क्यारी कुम्लाह गई
हिमगिरि में आग लग गई
दरख्तों पर ताबूत रख दिया
जन्नत नरक में बदल गया।

युवा आकांक्षायें कुचल गई
होठों की हंसी दुबक गई
घाटी में आतंक फ़ैल गया
जन्नत नरक में बदल गया।



















Thursday, October 5, 2017

तुम कहाँ हो ?

दामिनि दमकी, बरखा बरसी
काली घटा छाई, तुम कहाँ हो ?

मानसून गया, रावण भी दहा
दुर्गा भी आई, तुम कहाँ हो ?

करवा चौथ, मेहन्दी लगे हाथ
निकला चाँद, तुम कहाँ हों ?

ज्योति का त्योंहार, दीप जले
खुशहाली छाई, तुम कहाँ हो ?

सर्द मौसम, सुलगता अलाव
थरथराती देह, तुम कहाँ हो ?

बसंत बहार, होली का त्योंहार
रंगों की बौछार, तुम कहाँ हो ?


Tuesday, October 3, 2017

यादों के झुण्ड

फुर्सत के समय
आ घेरती है तुम्हारी यादें
तस्वीर से निकल खुशबु बन
फ़ैल जाती है इर्द-गिर्द

बचपन की मुलाकातें
ख्वाबों में डूबी रातें
रूठना और मनाना
बेपनाह बातें

एक के बाद एक
उमड़ पड़ते हैं
यादों के झुण्ड

कभी सोचा भी न था
एक दिन ऐसा भी आएगा
जब अकेले बैठ तन्हाई में
तुम्हारी यादों को जीवूंगा

लेकिन अब
इन यादों के सहारे ही
तय करना होगा
जीवन का अगला सफर

बड़ा मुश्किल होता है
तसल्ली देना अपने आप को
और तन्हाई में पौंछना
खुद के आँसू।




Monday, September 18, 2017

एक खुशनुमा तितली

जब तक रही
एक कली बन रही
अंतस को छूती रही
बिन मांगे गंध भरती रही

खुशबु बन
फ़ैलाती रही
अपनी सुवास
चहुं ओर

फूल की
पत्ती-पत्ती पर
लिखती रही
अपना नाम

जाते-जाते
खुशनुमा तितली बन
उड़ गई फूलों से
बिखेर गई अपने सारे रंग।

Monday, September 4, 2017

यादें मचलती रही

तुम मेरी जिंदगी में एक बहार बन कर आई
तुम्हारे संग में मेरी कविताएं महकती रही।

उम्मीद की किरण लिए मैं तुम्हें ढूंढता रहा
तसल्ली देता रहा मगर आँखें छलकती रही।

कल रात चांदनी मेरे कमरे में उतर आई
चाँद की चाँदनी में तुम्हारी यादें महकती रही।

महीनें वर्ष बीत गए पर चाहत कम नहीं हुई
तुम्हारी यादों की शाख ता-उम्र लचकती रही।

इन्हीं गलियों में तुम कभी साथ चली थी मेरे
साड़ियों की दूकान तुम्हारी राह देखती रही।

रात तुम्हारी यादों ने दिल को इस तरह छेड़ा
तकिया भीगता रहा और यादें मचलती रही।


Friday, September 1, 2017

सबसे प्यारी खुशबू

मैं आ गया हूँ शहर में 
छोड़ आया हूँ पीछे 
गाँव के घरों को 
गाँव की गलियों को 
गाँव के लोगो को 
लेकिन मेरे मन में 
रह गई है खेत में खड़ी 
बाजरी की बालियों की 
पकने की खुशबू 
जिसे मैं आज भी पहचानता हूँ 
दुनिया की सबसे प्यारी खुशबू 
के रूप में।  




Thursday, August 31, 2017

पक्षी भी उड़ान भरने से डरते हैं

मेरी आँख से अब
आँसूं नहीं निकलते
और नहीं दीखता है अब
मेरा उदास चेहरा

इसका अर्थ यह नहीं
कि मेरा विछोह का दर्द
अब कम हो गया है

असल में मैंने अपने
दर्द को ढक लिया है
इसलिए अब वह
अंदर ही अंदर तपता है

रिसता रहता है
देर रात तक आँखों से
गायब हो जाती है
रात की नींद भी आँखों से

कभी लिखूँगा वो सारी बातें
अपनी कविताओं में
जो मैंने सम्भाल रखी है
अपनी धड़कनों में

मेरी जिन्दगी तो अब
रेगिस्तान के उस टीले पर
खड़ी हो गई है जहां
पक्षी भी उड़ान भरने से डरते हैं।









Wednesday, August 30, 2017

हमें तो बहतर हुर्रें मिल जाए।

हम निर्दोषों पर गोलियाँ चला देंगे
हम दुनिया में कोहराम मचा देंगे
बस अल्लाह खुश हो जाए
हमें तो बस एक बार
बहतर हुर्रें मिल जाए।

हम दुनियां में आतंकवाद फैला देंगे
हम दुनियां में अत्याचार बढ़ा देंगे
बस अल्लाह की रहमत हो जाए
हमें तो बस एक बार
बहतर हुर्रें मिल जाए।

हम दुनियाँ में कोहराम मचा देंगे
हम मासूमों का कत्ले आम कर देंगे
बस अल्लाह की सलामती हो जाए
हमें तो बस एक बार
बहतर हुर्रें मिल जाए।

हम सब गोलियों से भून जाएगें
हम बिना कफ़न के मर जाएगें
भले ही हमारे चिंथङे उड़ जाऐ
हमें तो बस एक बार
बहतर हुर्रें मिल जाए।

Monday, August 28, 2017

मेरे अन्तर्मन में

तुम चली गई
इस धराधाम से
पर आज भी बैठी हो
मेरे अन्तर्मन में
जैसे रह जाती है
पहली वर्षा के बाद
मिट्टी में सौंधी महक
जैसे ढ़लता सूरज
छोड़ जाता है
झीने बादलों पर लाली
वैसे ही आज भी
तुम्हारी आँखों की चमक
तुम्हारी प्यारी हँसी
तुम्हारा समर्पण -भाव
तुम्हारा शील-स्वाभाव
सब कुछ बसा है
मेरे अन्तर्मन में
जो बह कर आ रहा है
मेरी कविताओं में
मेरे भावों में
मेरी बातों में।





Saturday, August 26, 2017

मैं सब से जबाब माँगता हूँ

हे धरती
तुम मुझे दो गज जमीं दो
कि मैं एक छोटा सा
घर बना सकूं

हे आकाश
तुम मुझे छोटी सी बदली दो
कि मैं सिर छुपाने एक
छत डाल सकूं

हे हवा
तुम मुझे थोड़ी शुद्ध हवा दो
कि मैं अपनी सांसों को
आराम से ले सकूं

हे नदी
तुम मुझे निर्मल जल दो
कि मैं स्वस्थ और निरोग
रह सकूं

हे इंद्रधनुष
तुम मुझे थोड़ा रंग दो
कि मैं अपने जीवन को
थोड़ा रंगीन बना सकूं

मैंने अपनी जरुरत भर ही तो
सब से माँगा था
फिर क्यों नहीं मिला मुझे
जीवन भर
मैं सब से जबाब माँगता हूँ।


Thursday, August 10, 2017

चरवाहें

मैंने देखा है
चरवाहों को खेजड़ी की
छाँव तले अलगोजों पर
मल्हार गाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को जंगल में
कमर से बंधी रोटी को
प्याज के साथ खाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को भेड़ के नवजात
बच्चे को गोद में लेकर
घर लौटते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को शाम ढले
पशुओं के झुण्ड को
घर लाते हुए

मैंने देखा है
चरवाहों को चिंता रहित
मस्त एवं स्वच्छंद जीवन
जीते हुए।



Friday, August 4, 2017

दो कविता

मन समझता है

एक सुबह
उस दिन हुयी थी
जब तुम मेरे साथ थी

एक सुबह
आज हुयी है जब
तुम मेरे साथ नहीं हो

मन समझता है
दोनों में कितना
अन्तर है।


 तुम जो साथ नहीं हो

जब तक तुम मेरे साथ थी
मुझे नदी, नाले
पहाड़,उमड़ते बादल
हरे-भरे खेत और
खलिहान
सभी अच्छे लगते थे

अच्छे तो वो आज भी है 
लेकिन अब अकेले ये नज़ारे
देखे नहीं जाते।

Thursday, July 13, 2017

एक कहानी का अन्त

चिता पर
लाया हुवा सारा सामान
रख दिया गया
चन्दन की लकड़ियों पर
घी उड़ेल दिया गया
चिता के चारों गिर्द घूम
पानी का मटका भी
फोड़ दिया गया
बेटे ने लकड़ी जला
मुखाग्नि भी दे दी
कल ठंडी पड़ी आग से
बची-खुची हड्डियां भी
इकट्ठी कर
गंगा को समर्पित हो जाएंगी।

और इसी के संग
भस्म हो जाएंगी
मेरे जीवन की सभी आशाएं
अंत हो जाएगा
एक कहानी का
जो पूरी लिखी जाने से
पहले ही दम तोड़ गई।

                                                      [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]


Saturday, May 20, 2017

जीवन का एक कटु सत्य

सुबह सवेरे
चाय के साथ
जब मैं सन्मार्ग पढ़ता हूँ
मुख्य पृष्ठ पर
सरसरी निगाहें डाल
मैं सीधा तथाकथित पेज
पर चला जाता हूँ
जहां एक अदद तस्वीर
के  साथ लिखा होता है
"बड़े दुःख के साथ सूचित
किया जाता है कि  ----"
यह देखने कि आज कोई
परिचित तो नहीं चला गया
मन में ख़याल आता है
एक दिन मेरा फोटो भी
इसी पेज पर छपेगा
मैं भी उस दिन एक
समाचार बन जावूंगा
घरकी दीवार पर फ्रेम में
लग जाएगी एक तस्वीर
पहना दी जाएगी माला
पुण्य तिथि पर बहु
एक पंडित को बुला कर
करवा देगी भोजन
दे देगी दक्षिणा में
एक धोती-गंजी और चंद रुपये
मेरा यह ख़याल
जीवन का एक कटु सत्य है
जिस पर हम सब को
विश्वास करना ही होगा।





Saturday, May 13, 2017

कुछ तो कह कर जाती

आज अचानक
सुना हो गया मेरा जीवन
क्या गलती की थी मैंने
जो मिला विछोह का
इतना बड़ा दर्द
अब तो आजीवन
अफसोस ही बना रहेगा
अंत समय नहीं था पास तुम्हारे
तुमने इतना वक्त भी नहीं दिया
कि आकर कर लेता थोड़ी सी बात
लोग पूरी करते है शतायु
अभी तो कईं बरस बाकी थे
रुक जाती कुछ और
भोगती जीवन का सुख
करते-करते सबकी देखभाल
अभी जाकर ही तो मिला था
थोड़ा आराम
चार-चार बेटे-बहुएं
सात पोते-पोतियाँ
भरा-पूरा परिवार
सब सुख था जीवन में
जानें क्यों रुठ गई अचानक
चली गई अनंत में
कहाँ खोजें और कहाँ देखें
अब कहने को भी कुछ नहीं बचा
शिकायत करें तो भी किससे
तुम तो चली गई
काश ! जाने से पहले
कुछ तो कह कर जाती।


                                            [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Friday, May 12, 2017

चीन की धरती पर

आज की तारीख
अठाइस अप्रेल दो हजार 
सतरह -शुक्रवार 
मैं चीन की धरती पर।
सिर ताने खड़ी है मेरे सामने 
चीन की विशालतम दिवार
फुसफुसा रही है वो 
कुछ कहने को मुझे।

मैंने कान लगाया 
टूटे-फूटे पत्थरों से 
आवाज आई 
अकेले आये हो 
कहाँ है तुम्हारी हमसफ़र
क्यों नहीं लाये साथ उसे ?

जब तुम आस्ट्रेलिया के
समुद्री नजारों को देखने गए
जब तुम स्वीट्जरलैण्ड की
मनोरम वादियाँ देखने गए
जब वेनिस की ठण्डी हवा खाने गए
जब ग्रेट बैरीयर रीफ देखने गए
हर समय वो तुम्हारे साथ रही।

आज क्यों छोड़ आये
क्यों नहीं साथ लाए उसे
चीन की दीवार दिखाने ?

मेरे लिए कदम बढ़ाना
मुश्किल हो गया
मन में इस तरह के भाव
पहले भी कईं बार आ चुके हैं। 

चाहे वो गोवा के समुद्र तट हो 
या दुबई की गर्म रेत,
जहां भी मैं अकेला गया 
मेरे मन को हर जगह 
यह  सुनाई पड़ा है

मैं भारी कदमों से
आगे बढ़ा इस कसक के साथ
कि काश! हम दोनों पहले ही
साथ - साथ आए होते।










Tuesday, April 18, 2017

ममता की मूरत

तुम
बदली बन बरसती रही
करती रही प्यार की
बरसात सभी पर।

तुम
जलधारा बन बहती रही
छलकाती रही
प्रेम-रस सभी पर।

तुम
लोरी बन गाती रही
लहराती रही
प्यार का आँचल
सभी पर।

तुम
किरण बन चमकती रही
लुटाती रही चांदनी
सभी पर।

तुम
ममता की मूरत बन झरती रही
बहाती रही स्नेह की धारा
सभी पर।







Monday, April 17, 2017

गाँव की गलियों में बचपन

देश के महानगर में 
रह कर भी मुझे
गाँव की याद आती है 

आलिशान कोठियों में 
रह कर भी
मुझे गाँव वाले घर की
याद आती है। 

हवाई जहाजों में सफर
करते  हुए भी 
मुझे  बैल गाड़ी की
याद आती है।  

शितताप नियंत्रित 
घरों में रहते हुए भी मुझे
बरगद की ठण्डी छाँव 
याद आती है। 

पांच सितारा होटलों में 
खाना खाते हुए भी मुझे 
माँ के हाथ की रोटी की 
याद आती है। 

कर्ण-प्रिय संगीत  
सुनते हुए भी मुझे 
अलगोजे पर मूमल की
याद आती है।   

सुखी जीवन
जीते हुए भी मुझे
गाँव की गलियों में बिताए
बचपन की याद आती है।






Saturday, April 8, 2017

स्मृति मेघ

पचास ऋतुचक्रों को समर्पित
इस जीवन के संग-सफर में
आज हर एक मोड़ पर
मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा
जरुरत है।

पर मैं जानता हूँ
तुम अब इस जीवन में
मुझे कभी नहीं मिलोगी।

मैं चाह कर भी
तुम्हारी कोई झलक
कोई आवाज
कोई खबर
नहीं ले पाऊंगा।

फिर भी मैं तुम्हें
हर मौसम
हर महीने
हर सप्ताह
हर दिन
हर लम्हा
पूरी उम्र भर
इस जीवन के सफर में जीवूंगा।




Friday, April 7, 2017

मेरी आँखों में सावन-भादो उत्तर गया

मेरे जीवन में कोई उल्लास नहीं रहा
           मेरे जीवन में कोई मधुमास नहीं रहा
                   मेरे जीवन का स्वर्णिम सूरज डूब गया
                          मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।


मेरे जीवन में खुशियां की सौगात नहीं रही
         मेरे जीवन में पायल की झनकार नहीं रही
                   मेरे जीवन का मंगल गान बिसर गया
                         मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।


मेरी पलकों में सुनहरा स्वपन नहीं रहा
        मेरे होठों पर प्यार भरा गीत नहीं रहा
                मेरा हमसफर जीवन राह में बिछुड़ गया 
                        मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया। 


मेरे जीवन में अधरों का हास नहीं रहा
        मेरे जीवन में गीतों का सार नहीं रहा                                       
                 मेरे जीवन से सुख का कारवाँ गुजर गया
                          मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।                       





















Tuesday, March 14, 2017

याद आता है, मुझको मेरा गाँव

बहुत याद आता है, मुझको मेरा गाँव।
कुँआ वाले पीपल की, ठंडी ठंडी छाँव।

बैलो वाली गाड़ी और हरे-हरे खेत।
याद आती है मुझे, धोरा वाली रेत।
कुऐ का पीना, ठंडा-ठंडा पानी।
याद आती है, दादी की कहानी।

लम्बी-लम्बी बाजरी, रोईड़ा का फूल।
याद आती है मुझे, गलियों की धूल।
सर्दी की रातें और गोधूलि की बेला।
रात में खेलना लुका छिपी का खेला।

सावन में झूला और रंगों से होली।
मुझे याद आती है, प्यारी दिवाली। `
गणगौर का मेला, बैलों का दौड़ना।
सभी को प्यार से, रामराम कहना।

बहुत याद आता है, मुझको मेरा गाँव।
कुँआ वाले पीपल की, ठंडी ठंडी छाँव।


Monday, March 6, 2017

आज भी

आज भी लगी है
उस दर्पण पर तुम्हारी बिंदी
जहाँ संवारा करती थी
तुम अपने बालों को

आज भी पड़े हैं 
पार्क की पगडंडी पर
तुम्हारे पांवों के निशान
जहाँ जाती थी तुम घूमने को

आज भी छत पर
 पक्षियों की टोलियां
करती है तुम्हारा इन्तजार 
दाना-पानी लेने को 

आज भी दरवाजे पर 
धोली गाय आकर रंभाती है 
खाने गुड़ और रोटी को

आज भी मिलती है
सूखे गुलाब की पंखुड़ियां
खोलता हूँ जब किताब को 

Monday, January 23, 2017

जीवन बे-राग री

कहने को जीवन
खाली मन-प्राण
प्यार के आभाव में
फीका सब गान
साज टूटा, स्वर रूठा,जीवन बे-राग री।

तन्हाई में रहना
जुदाई को सहना
घुट-घुट कर जीना
टूट-टूट बिखरना 
उदासी छाई,आँखे भर आई,मिटा अनुराग री।

भूल गए  हम तो
मिलन की बातें
याद भला कहाँ
वो सुनहरी रातें
याद दिलाई, प्रीत लगाईं, बजा मृदु राग री।

झोली भर लाई
नेह भरी बातें
होंठ फिर हँसे
सुन प्रीत की बातें
तुमने जगाई, फिर लगाई, प्रेम आग री।


Wednesday, January 18, 2017

कथनी और करनी

मैं पढ़ता रहा
समाजवाद, मार्क्सवाद
और प्रजातंत्रवाद पर लिखी पुस्तकें
और तुम खिलाती रही भिखारियों को,
गायों को और कुतो को रोज रोटी।

मैं सुनता रहा पर्यावरण पर
लंबे-चौड़े भाषण और
तुम पिलाती रही तुलसी को
बड़ को और पीपल को रोज पानी।

मैं चर्चाएं करता रहा
टालस्टाय, रस्किन और
गाँधी के श्रम की महता पर
और तुम करती रही सुबह से
शाम तक घर का सारा काम।

मैं सेमिनारों में सुनाता रहा
पशु-पक्षियों के अधिकारों के बारे में
और तुम रोज सवेरे छत पर
देती रही कबूतरों को, चिड़ियों को
और मोरो को दाना-पानी।

मैं सुनता रहा
उपदेशो और भाषणों को
और तुम रोज पढ़ाती रही
निर्धन बच्चों को
देती रही उन्हें खाना
कपड़े और दवाइयाँ।

तुमने मुझे दिखा दिया
दुनिया कथनी से नहीं
करनी से बदलती है।

काम कर्मठ हाथ करते हैं
थोथले विचारों से
दुनिया नहीं बदलती है।