Thursday, January 24, 2013

समै रो जथारथ (राजस्थानी कविता )

घर सूं कागद आवंतो जणा
सात समाचार लिख्योडा आवंता
बदलाव समैरो
लोग कागद लिखणो ही भुलग्या
,ई'मेल स्यूं आधा आखर लिख''र  ही
काम काढबा लागग्या

तीज त्योंहार आयां घर-आंगणा मांय 
हिरमिच-गेरू का मांडणा मांडता
चालगी आन्थुणी पून 
अब प्लास्टिक का स्टीकर लगा''र ही
 काम काढबा लागग्या

ब्याव-सावै पीला चावल देंवता 
मान-मनवार स्यूं बूलावंता 
अब तो प्रीत-प्रेमरी बात ही कोनी
 सीधा मोबाइल पर मेसेज भेज''र ही
काम काढबा लागग्या

मरणै-खरणे री खबर सुण्या
सगळ गाँव का लोग भेळा हुंवता
समै रो जथारथ
अब तो लोग मुंडो दिखा"र ही
 काम काढबा लागग्या

मिलता जणा जै रामजीकी कैंवता
 दुःख-सुख की दो बात पूछता
अब तो नुवीं हवा रा लैरका सरणाट बेवै
लोग-बाग़  हाय-हल्लो कर ही 
काम काढ़बा लागग्या

उन्याला में गाँवतरा स्यूं कोई आंवतो जणा
 भर बाटको छाछ -राबडी घालता
 पी"र कालजो तिरपत हुज्यातो
अब तो एक कप चाय पकड़ा"र ही
  काम काढ़बा लागग्या

होली दयाळी  एक दूजा रे घरा जांवता
जणा बडोड़ा ने पांवाधोक देंवता
टाबरियाँ न लाड़ करता
अबै नै की आणी नै की जाणी
सगला लैपटॉप मांय ही सिमटण  लागग्या।




[ यह कविता  "एक नया सफर " में प्रकाशित हो गई है। ]

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