Monday, January 15, 2018

देखो मकर सक्रांति आई है

कहींअर्पण किया
कहीं तर्पण किया
कहीं समर्पण भी हुई है
देखो मकर सक्रांति आई है

कहीं लोहड़ी मनाई
कहीं पोंगळ मनाई
कहीं बिहू भी कहलाई है
देखो मकर सक्रांति आई है

कहीं तिलकुट मंगाया
कहीं खिचड़ा बनाया
कहीं रेवड़ी भी आई है
देखो मकर सक्रांति आई है

सूर्य उत्तरायण को भए
भक्त गंगा सागर को गए
कहीं पतंग भी उड़ाई है
देखो मकर सक्रांति आई है।




Tuesday, January 9, 2018

घर की निशानी चली गई।

बस्ते के बोझ तले बचपन बीत गया
मस्ती भरी सुहानी नादाँ उम्र चली गई।

तेल,नून,लकड़ी के भाव पूछता रह गया
जीवन से झुंझती मस्त जवानी चली गई।

बुढ़ापा क्या आ गया सब कुछ चला गया
दरिया सरीखी दिल की रवानी चली गई।

चूड़ियाँ, बिन्दी, मंगलसुत्र सब हट गया
औरतों के सुहाग की निशानी चली गई।

पढ़-लिख कर बेटा शहर में बस गया
बाप के बुढ़ापा की उम्मीद चली गई।

गांव का जवाँ फ़िल्मी गीतों में रम गया
लोकगीत-अलगोजे की बातें चली गई।

गांव में खाली पड़ा मकान बिक गया
गांव की जमीं से घर की निशां चली गई।  

Wednesday, January 3, 2018

बरस बीतग्या (राजस्थानी कविता )


सहेळ्या रो झुलरो
माथै पर घड़ो
बणीठणी पणिहारी देख्या न्हं
बरस बीतग्या

सोनल बरणा धौरा
खेजड़ी रा खोखा
मोरिया रो नाच देख्यां न्हं
बरस बीतग्या

गर्मी अर लूवां
सरदी अर डांफर
भूतियो बगुळियो देख्यां न्हं
बरस बीतग्या

आसोज रो महीनूं
रिमझिम बरसतो म्है
गुवाळीयै रो अलगोजो सुण्या न्हं
बरस बीतग्या

आखा अर जोत 
भोपा अर परचा 
ब्याव रा रातीजोगा सुण्यां न्हं 
बरस बीतग्या।

फोग'र रोहिड़ा
खेत'र खळां
मदुआ ऊंटां री गाज सुण्यां न्हं
बरस बीतग्या।




Monday, December 25, 2017

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं

भूल गया मैं सब रंगरलियाँ
सुख गई खुशियों की बगियाँ
जीवन की झांझर बेला में
पाई मैंने विछोह की पीड़ा

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा। 

लाख बार मन को समझाया
फिर भी मन नहीं भरमाया 
आँखों से अश्रु जल बहता 
कैसे छिपाऊं मन की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा।

डुब गया सूरज खुशियों का
संग-सफर छूटा जीवन का  
तुम तो मुक्त हुई जीवन से
मैंने पाई वियोग की पीड़ा 

कैसे मैं तुम को लिख भेजूं 
अपने विरह-दर्द की पीड़ा। 

Friday, December 22, 2017

बहुत याद आती है

जब भी आकाश से
बरसती है रिमझिम बूँदें
मुझे याद आती है तुम्हारे
गेसुओं से टपकती बूँदें

मैं अक्सर खड़ा हो जाता हूँ
खिड़की खोल कर
देर तक खड़ा रहता हूँ
यादों की चादर ओढ़ कर

ऐसे बदलते मौसम में
बहुत याद आती है तुम्हारी
हवा की छोटी सी दस्तक भी
आहट लगती है तुम्हारी

बहुत सारे महीने और वर्ष
बित गए तुमसे बिछड़े
लेकिन तुम्हारा इन्तजार और
यादें आज तक नहीं बिछड़े

तुम्हारे इन्तजार में
आज भी आहें भरता हूँ
हर सांस के संग
तुम्हें याद करता हूँ

तुम्हारी सूरत आँखों से
निकल नहीं पाती है
जितना भी भुलना चाहता हूँ
उतनी याद अधिक आती है।






Wednesday, December 13, 2017

मेरी आँखें भर आई ( थोड़ी मृत्यु मुझे भी आई है )

सूर्य का प्रकाश
कमरे से लौट रहा है
शाम का धुंधलका
अपने पांव पसार रहा है

मैं अकेला कमरे में
लौट आया हूँ
तुम्हारे संग बिताए
लम्हों को ढूंढ रहा हूँ

तुम्हें याद करते ही
आँखों से अश्रु छलक आते हैं
तुम्हारी एक झलक पाने को
मेरे नयन तरस जाते हैं

तुम्हारी यादों की नदी
मेरे अन्दर बहुत गहरी बहती है
लहरें मेरे विरह के घावों को
सहलाती रहती है

मैं तुम्हारी यादों के छोरों को
अपने संग जोड़ता हूँ
रात  के सन्नाटे में
टुकड़े-टुकड़े सोता हूँ

मेरी जिंदगी की सारी खुशियाँ
तुम्हारे संग चली गई है
तुम्हारी मृत्यु के साथ
थोड़ी मृत्यु मुझे भी आई है।


Friday, December 8, 2017

तुम आओगी ना

दिसंबर आ गया
तुम्हारा पश्मीना साल
अभी तक ज्यों का त्यों
रखा है अलमारी में
तुम्हें ही ओढ़ना है ना
तुम आओगी ना

ठण्ड भी बढ़ गई है
मेरा स्वेटर, मफलर
निकाल कर धुप में
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना

सुबह उठ कर
अदरक वाली चाय बना
तुम्हें ही पिलाना है ना
तुम आओगी ना

मीठी आंच में सेंक
गरम-गरम भुट्टे
निम्बू-नमक लगा
तुम्हें ही देना है ना
तुम आओगी ना।