Tuesday, April 17, 2018

पांच वर्ष की पोती आयशा

मेरी पांच वर्ष की पोती
आयशा
नहीं जानती
चाँद, तारों और परियों
के बारे में

उसने नहीं देखा
कभी अम्बर में
आकाशगंगा को
तारों की बरात को
वह नहीं जानती चाँद में
सूत कातती  बुढ़िया को

उसने नहीं सुनी
परियों की कहानियाँ
जो उतर कर आती है
आसमान से  धरती पर

जिनके उड़ने के लिए
लगे रहते है सफ़ेद पंख
हाथ में जिनके रहती है
सुनहरी जादू की छड़ी

आयशा के पास
ढेर सारे खिलोनें हैं
पेंटिंग के लिए कलर्स
अल्फाबेट की पुस्तकें हैं

अब तो वो खेलने लगी है
अपनी मम्मी के मोबाइल्स से
शिनचैन, नोबिता जैसे
कार्टूनों के संग विडिओ गेम

उसे नहीं मालूम
चाँद, सितारें और परियों की
 दुनिया के बारे में।






Monday, April 16, 2018

जितना दिया है उतना ही तो मिलेगा

आज बेटे की
शादी की सालगिरह है
बेटे ने आकर बाप को
प्रणाम भी नहीं किया है
बहु ने रास्ते चलते
ससुर को प्रणाम कर अपना
फर्ज निभा लिया है।

शाम को होटल में
डिनर और केक कटाने का
प्रोग्राम बना है
बेटे ने अपने दोस्त को बुलाया है
उसकी बहु को भी बुलाया है
मुंबई से आई
जान- पहचान वाली को भी
आमंत्रित किया है
लेकिन नहीं कहाँ बेटे ने
आपने बाप को
कि चलना आज होटल में
सभी साथ खाना खाएंगे
और केक काटेंगे।

बाप अकेला घर पर था
सोच रहा था कि क्या कल
इसके बेटे भी इसके साथ
इसी तरह का व्यवहार करेंगे ?
क्या उसे भी उतना ही दुःख होगा ?
सोच के साथ ही
बाप ने माथे को झटक दिया
सोचा नहीं नहीं
उन्हें इतना दर्द नहीं होगा
क्योंकि उन्होने जितना दिया है
उतना ही तो मिलेगा।


Tuesday, April 10, 2018

देखो प्यारा बसंत आया

देखो प्यारा बसंत आया

सर्दी की हो गई विदाई
हवा सौरभ लेकर आई
बादलों से ब्योम  छाया
देखो प्यारा बसंत आया

बागों में कोयल कुहकी
बौरों से बगिया महकी
भंवरा फूलों से कह आया
देखो प्यारा बसंत आया

पिली सरसों से खेत सजे
नव पल्लवों  से पेड़ सजे
फूलों-पत्तों में रंग छाया
देखो प्यारा बसंत आया

धरती का आँगन महका
गौरी बाँहों में प्यार सजा
अभिसार का मौसम आया
देखो प्यारा बसंत आया ।


Saturday, April 7, 2018

ओखली,मुसल और घट्टी

गांव के
आँगन के एक कोने में
उपेक्षित ओखली पड़ी है
साथ खड़ा है मुसल

रसोई के
बरामदे में दूसरे कौने में
उपेक्षित पड़ी है घट्टी

दोनों को
आज भी इन्तजार है
चूड़ियों के खनकने की

बड़े शहरों में
इन्हें अब सजाया जाता है
"पधारो म्हारे देश"
जैसे प्रोग्राम में

ताकि आज की
पीढ़ी एक बार देख सके
लुप्त होती धरोहर को

अनुभव कर सके
अपने पूर्वजों के
कठिन परिश्रम को

उनकी दादी कभी
पीसती थी घट्टी से आटा
घर भर के लिए
मुंह अंधेरे में

कूटती थी खिचड़ा
ऊंखल-मुसल से
जिसकी खुद-बुद महक
फैलती थी घर भर में।

विरह वेदना

जुदा हो कर भी वो मेरे जहन में बसी है
विरह वेदना उसकी आज भी सत्ता रही है।

फूल सा दिल कुम्भला गया वो चली गई 
आँखें आज भी उसकी राह देख रही है।

हवा में उसके गुजरे पलों के नगमें घुले हैं
उसकी गुजरी हुई साँसें मिलने आ रही है। 

याद करता नहीं फिर भी, याद आ रही है
उसकी याद में, नयनों से प्रीत बह रही है।

वो तो आज भी मेरी सांसों संग बसी हुई है 
साँसों से ज्यादा तो उसकी यादें आ रही है। 

जीवन की संध्या में, सारी खुशियां खो गई
यादों की पीड़ा मन्दाकिनी सी बह रही है।










Thursday, March 8, 2018

अच्छा होता कोई आकर

अच्छा होता कोई आकर
जीवन के पतझड़ में
बसन्तोत्सव मना जाता

अच्छा होता कोई आकर
प्यासे होंठों को
शीतल जल पीला जाता

अच्छा होता कोई आकर
निस्सार जीवन को
प्यार की खुशबू दे जाता

अच्छा होता कोई आकर
तन्हाई के जीवन में
हमसफ़र बन जाता

अच्छा होता कोई आकर
बिखरते जीवन को
बाहों का स्पर्श दे जाता

अच्छा होता कोई आकर
बियावान सन्नाटे में
प्यार का सितार बजा जाता।





Wednesday, February 21, 2018

करले मन की होली में

रंग प्यार का लिए खड़ा मैं
नैन बिछाए राहों में
एक बार आ जाओ सजनी
प्रीत जगाने बाहों में

चार होलियां निकल गई
बिना तुम्हारे रंगों में
एक बार आ जाओ जानम
रंग खेलेंगे होली में

यादों के संग मन बहलाया
मुश्किल बहलाना होली में
एक बार आ जाओ मितवा
धाप लगाए चंगों में

लहरों जैसा मन डोले
आज मिलन की आसा में
एक बार आ जाओ रमणी
घूमर घाले होली में

मन का भेद, मर्म आँखों का
खुल जाता है होली में
एक बार आ जाओ मानिनी
करले मन की होली में।